Yoga – योग एक अध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर और आत्मा (ध्यान ) को एकरूप करना ही योग है। एक पूर्ण जीवन शैली है। यह एक पूर्ण विज्ञान एवं अध्यात्म – विद्या हैं। योग व्यक्ति के निर्माण और उत्थान में ही नहीं , बल्कि परिवार , समाज , राष्ट्र और विश्व के चहुंमुखी विकास में भी यह उपयोगी सिद्ध हुआ है। वर्तमान में मानव समाज जिस तनाव , अशांति , अभाव एवं अज्ञान का शिकार है उसका समाधान केवल योग ही है। योग (Yoga) का हमारे वेदों , पुराणों , उपनिषदों एवम् गीता में अनादि काल से उपयोग होता रहा है।
विष्णुपुराण के अनुसार – योग: संयोग इत्युक्त: जीवात्मपरमात्मने अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।
श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार – सिद्धा सिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते (२ /४८ ) अर्थात् सुख – दुःख , हानि – लाभ , शत्रु – मित्र और शीत – उष्ण आदि द्वंद्वों में सर्वत्र समभाव रखना योग है।
महर्षि पतंजलि योग दर्शन के अनुसार – चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
Yoga : योग के प्रकार
दत्तात्रेय योगशास्त्र तथा योगराज उपनिषद् में योग के चार प्रकार मंत्रयोग , लययोग , हठयोग और राजयोग माने गए हैं
1. मंत्रयोग Mantra Yoga –
‘ मंत्र का समान्य अर्थ है- ‘मननात् त्रायते इति मन्त्रः’। मन को त्राय (पार कराने वाला) मंत्र ही है। मन्त्र योग का सम्बन्ध मन से है, मन को इस प्रकार परिभाषित किया है- मनन इति मनः। जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है। मंत्र योग के बारे में योगतत्वोपनिषद में वर्णन इस प्रकार है-योग सेवन्ते साधकाधमाः।
मंत्र से ध्वनि तरंगें पैदा होती है मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है। मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्व है वे घटक-उच्चारण, लय व ताल हैं। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को बढ़ा देता है। मंत्रजप मुख्यरूप से चार प्रकार से किया जाता है।(1) वाचिक (2) मानसिक (3) उपांशु (4) अजप्पा । मंत्रयोग को विधिपूर्वक जपने से व्यक्ति को अणिमा आदि सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
2. लययोग Laya Yoga –
दैनिक क्रियाओं को करते हुए सदैव ईश्वर का ध्यान करना लययोग हैं। चित्त का अपने स्वरूप विलीन होना या चित्त की निरूद्ध अवस्था लययोग के अन्तर्गत आता है। साधक के चित्त् में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रह्म का ध्यान रहे इसी को लययोग कहते हैं। योगत्वोपनिषद में इस प्रकार वर्णन है-गच्छस्तिष्ठन स्वपन भुंजन् ध्यायेन्त्रिष्कलमीश्वरम् स एव लययोगः स्यात (22-23)
3. हठयोग Hath Yoga –
हठयोग में विभिन्न मुद्राओं , आसनों , प्राणायाम एवं बंधो के अभ्यास से शरीर को निर्मल एवं मन को एकाग्र किया जाता हैं।
हठ का शाब्दिक अर्थ हठपूर्वक या जिद्द पूर्वक किसी कार्य को करने से लिया जाता है। हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठ का अर्थ इस प्रकार दिया है-हकारेणोच्यते सूर्यष्ठकार चन्द्र उच्यते।सूर्या चन्द्रमसो र्योगाद्धठयोगोऽभिधीयते॥
ह का अर्थ सूर्य तथा ठ का अर्थ चंद्र बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है। शरीर में 72 हजार नाड़ियाँ है उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है, वे इस प्रकार हैं। सूर्यनाड़ी अर्थात पिंगला जो दाहिने स्वर का प्रतीक है। चन्द्रनाड़ी अर्थात इड़ा जो बायें स्वर का प्रतीक है। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है।
इस तरह हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रहमरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है। हठ प्रदीपिका में हठयोग के चार अंगों का वर्णन है- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान। घेरण्ड संहिता में सात अंग- षटकर्म, आसन, मुद्राबन्ध, प्राणायाम, ध्यान, समाधि जबकि योगतत्वोपनिषद में आठ अंगों का वर्णन है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि
4. राजयोग Raj Yoga –
राजयोग सभी योगों का राजा कहलाया जाता है, यम नियम आदि के अभ्यास से चित्त को निर्मल कर ज्योतिर्मय आत्मा का साक्षात्कार करना राजयोग कहलाता है। राज का अर्थ दीप्तिमान , ज्योतिर्मय , तथा योग का अर्थ समाधि अथवा अनुभूति होता है।
राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है।
महर्षि पतंजलि के अनुसार समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्त प्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेक ख्याति प्राप्त होती है।योगाडांनुष्ठानाद शुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेक ख्यातेः (2/28)
राजयोग के अन्तर्गत महर्षि पतंजलि ने अष्टांग को इस प्रकार बताया है-यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टांगानि।
Yoga : योग का स्वरूप
सनातन या भारतीय दर्शन में योग एक अति महत्वपूर्ण शब्द है। आत्मदर्शन एवं समाधि से लेकर कर्मक्षेत्र तक योग का व्यापक व्यवहार हमारे शास्त्रों में किया है।
गीता में ध्यानयोग , सांख्ययोग एवं कर्मयोग के बारे में विस्तृत विवेचन है। गीता के पंचम अध्याय में संन्यासयोग एवम् कर्मयोग में कर्मयोग को श्रेष्ठ माना गया है। योग का अर्थ है अपनी चेतना (अस्तित्व) का बोध अपने निहित शक्तियों को विकसित करके परम चैतन्य आत्मा का साक्षात्कार एवं पूर्ण आनंद की प्राप्ति।
योग की इस प्रक्रिया में विविध प्रकार की क्रियाओं का विधान हमारे ऋषि मुनियों ने किया है। इसमें मुख्य रूप से अष्टांग योग – यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधि मुख्य है।
Yoga : योग का शरीर पर प्रभाव

यौगिक क्रियाओं से हमारी सुप्त चेतना शक्ति का विकास होता है। सुप्त तंतुओं का पुनर्जागरण होता है एवम् नए तंतुओं और कोशिकाओं का निर्माण होता है। योग की सूक्ष्म क्रियाओं द्वारा हमारे सूक्ष्म स्नायुतंत्र को सक्रिय किया जाता है , जिससे उनमें ठीक प्रकार से रक्त – संचार होता है और नई शक्ति का विकास होने लगता है।
योग से रक्त संचार पूर्ण रूप से सम्यक रीति से होने लगता हैं। शरीर विज्ञान का यह सिद्धांत है कि शरीर के संकोचन एवम् प्रसारण होने से उनकी शक्ति का विकास होता है तथा रोगों की निवृति होती है। योगासनों से यह प्रक्रिया सहज ही हो जाती हैं।
आसान एवम् प्राणायामो के द्वारा शरीर की ग्रंथियों एवम् मांसपेशियों में कर्षण – विकर्षण, आकुंचन – प्रसारण तथा शिथिलीकरण की क्रियाओं द्वारा उनका आरोग्य बढ़ता है। रक्त को वहन करने वाली धमनिया एवं शिराए भी स्वस्थ्य हो जाती है।
आसन एवं यौगिक क्रियाओं से पेंक्रियाज सक्रिय होकर इंसुलिन ठीक मात्रा में बनने लगता हैं। जिससे मधुमेह आदि रोग दूर होते हैं।
पाचनतंत्र की स्वस्थता पर पूरे शरीर की स्वस्थता निर्भर करती है। सभी रोगों का मूल कारण पाचनतंत्र की अस्वस्थता है। यहां तक कि हृदयरोग जैसी गंभीर बीमारी का कारण भी पाचन तंत्र का अस्वस्थ होना पाया गया है। योग से पाचनतंत्र पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाता है जिससे संपूर्ण शरीर स्वस्थ , हल्का एवं स्फूर्तियुक्त बन जाता है।
योग से फेफड़ों में पूर्ण स्वस्थ वायु का प्रवेश होता हैं , जिससे फेफड़े स्वस्थ होते हैं तथा दमा , श्वास , एलर्जी आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।
यौगिक क्रियाओं से मेद (चर्बी) का पाचन होकर शरीर का भार कम होता है और शरीर स्वस्थ , सुडौल एवं सुन्दर बनता है। इतना ही नहीं, इस स्थूल शरीर के साथ साथ योग सूक्ष्म शरीर एवम् मन के लिए भी अनिवार्य है
योग से इंद्रियो एवं मन का निग्रह होता है। यम नियम आदि अष्टांग योग के अभ्यास से व्यक्ति अपने दिव्य स्वरूप ज्योतिर्मय , आनंदमय , शांतिमय , परम चैतन्य आत्मा एवं परमात्मा तक पहुंचने में समर्थ हो जाता है।
आप भी योग को अपने जीवन में अपनाकर इसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आपके अमूल्य सुझाव , क्रिया प्रतिक्रिया स्वागतेय है ।
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