महाशिवरात्रि (Mahashivratri) भारतीय संस्कृति का सबसे पवित्र पर्व है, जो भगवान शिव की आराधना को समर्पित है। इस पावन दिन पर एक परंपरा विशेष रूप से चर्चा में रहती है – भांग (bhang) का सेवन। कुछ लोग इसे धार्मिक मानते हैं तो कुछ इसे नशे का बहाना। आइए, वेदों, पुराणों, आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान के प्रकाश में इस विषय की गहराई से समझें।
वैदिक साहित्य में भांग का उल्लेख
अथर्ववेद में भांग का स्थान
अथर्ववेद (Atharvaveda), जो चारों वेदों में से एक है, में भांग को पाँच पवित्र पौधों में से एक माना गया है। अथर्ववेद के ग्यारहवें काण्ड में इसका उल्लेख मिलता है:
“भंगे भव पञ्चपाणिके वीरुधां शिरोमणि”
(हे भांग! तुम पाँच पत्तों वाले हो और औषधियों में श्रेष्ठ हो)
यह श्लोक भांग को एक औषधीय पौधे (medicinal plant) के रूप में प्रतिष्ठित करता है, न कि मात्र नशीले पदार्थ के रूप में। वैदिक काल (Vedic period) में भांग का प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों (religious rituals) और आयुर्वेदिक चिकित्सा (Ayurvedic treatment) में किया जाता था।
सोम और भांग: एक आध्यात्मिक संदर्भ
ऋग्वेद में सोमरस (Soma Rasa) का विस्तृत वर्णन है, जिसे देवताओं का पेय माना गया। कुछ विद्वानों का मानना है कि सोम और भांग में आध्यात्मिक समानता (spiritual similarity) है – दोनों का उपयोग चेतना को उन्नत करने और ध्यान में गहराई लाने के लिए होता था।
पौराणिक कथाएँ और भगवान शिव
समुद्र मंथन की कथा
शिव पुराण (Shiva Purana) में समुद्र मंथन की कथा आती है। जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो उसमें से हलाहल विष (deadly poison) निकला। इस विष को पीकर भगवान शिव ने सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा की। देवी पार्वती ने विष को शिव के शरीर में फैलने से रोकने के लिए उनके गले को दबा दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
कुछ लोक परंपराओं के अनुसार, विष की तीव्रता को शांत करने के लिए शिव को चंद्रमा, गंगाजल और औषधीय पौधे दिए गए। यहीं से भांग को शिव से जोड़ने की परंपरा का जन्म हुआ। हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि किसी भी प्रामाणिक शास्त्र में यह स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि भगवान शिव ने भांग का सेवन किया।
शास्त्रीय सत्य
शिव पुराण, लिंग पुराण या अन्य प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि भगवान शिव भांग या किसी नशीले पदार्थ का सेवन करते थे। यह धारणा बाद की लोक संस्कृति और कलाकारों की कल्पना से विकसित हुई है।
आयुर्वेद में भांग: औषधीय दृष्टिकोण
आयुर्वेदिक गुण-धर्म
आयुर्वेद में भांग (Cannabis sativa) को एक शक्तिशाली औषधि माना गया है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसके गुणों का वर्णन मिलता है:
रस (Taste): तिक्त, कषाय (कड़वा, कसैला)
गुण (Properties): उष्ण वीर्य (warm potency), तीक्ष्ण (sharp)
प्रभाव (Effects): वात-कफ शामक (Vata-Kapha balancing)
चिकित्सीय उपयोग
आयुर्वेद में भांग का प्रयोग निम्न स्थितियों में किया जाता है:
- पीड़ाहारक (Pain reliever): तंत्रिका दर्द, गठिया (arthritis)
- निद्रा लाने में (Sleep inducer): अनिद्रा के उपचार में
- पाचन क्रिया (Digestive system): IBS और अपच में सहायक
- मानसिक शांति (Mental calmness): चिंता और तनाव (anxiety and stress) में नियंत्रित मात्रा में
परंतु यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आयुर्वेद में भांग का उपयोग केवल वैद्य के मार्गदर्शन में, नियंत्रित मात्रा में और विशिष्ट रोगों के उपचार के लिए किया जाता है – मनोरंजन या धार्मिक उत्सव के नाम पर नहीं।
आधुनिक वैज्ञानिक शोध
कैनाबिनॉइड्स का चिकित्सीय महत्व
आधुनिक विज्ञान (modern science) ने भांग में मौजूद कैनाबिनॉइड्स (cannabinoids) जैसे CBD (cannabidiol) और THC (tetrahydrocannabinol) पर व्यापक शोध किया है।
2024 के शोध (Research Studies) के अनुसार:
- CBD में सूजन-रोधी (anti-inflammatory) गुण होते हैं
- कैंसर (cancer) उपचार में कीमोथेरेपी के दुष्प्रभाव कम करने में सहायक
- मिर्गी (epilepsy) और पार्किंसंस (Parkinson’s disease) में लाभकारी
भारतीय संस्थानों जैसे CIMAP (सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिनल एंड अरोमैटिक प्लांट्स) ने भी भांग के औषधीय गुणों पर परियोजनाएं शुरू की हैं।
चेतावनी: दुरुपयोग के खतरे
वैज्ञानिक शोध यह भी बताते हैं कि अनियंत्रित और मनोरंजक उपयोग से:
- मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं (mental health issues)
- स्मृति क्षति (memory loss)
- निर्णय क्षमता में कमी (impaired judgment)
- निर्भरता (dependency) का खतरा
भोलेनाथ और भांग का रहस्य: धर्म या भ्रम?
सही धार्मिक दृष्टिकोण
भारतीय आध्यात्मिकता (Indian spirituality) का मूल सिद्धांत है – “शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्” (शरीर ही धर्म साधना का प्रथम साधन है)। किसी भी ऐसी वस्तु का सेवन जो शरीर, मन और आत्मा को हानि पहुँचाए, वह धर्म नहीं हो सकता।
भ्रम और सत्य
भ्रम (Misconception): शिवरात्रि पर भांग पीना अनिवार्य धार्मिक कृत्य है
सत्य (Reality): कोई भी शास्त्र इसे अनिवार्य नहीं बताता
भ्रम: भगवान शिव भांग पीते थे
सत्य: कोई प्रामाणिक ग्रंथ इसकी पुष्टि नहीं करता
भ्रम: धार्मिक अवसर पर नशा करना स्वीकार्य है
सत्य: धर्म संयम और आत्म-नियंत्रण (self-control) सिखाता है
सांस्कृतिक परंपरा का विकास
भांग को शिव से जोड़ने की परंपरा कब और कैसे विकसित हुई? यह मध्यकाल में विशेषतः तांत्रिक परंपराओं और साधु-संन्यासियों की संस्कृति से प्रभावित हुई। कुछ साधु समाधि (spiritual trance) और ध्यान में गहराई के लिए इसका प्रयोग करते थे, जो बाद में सामान्य लोगों में भी फैल गया।
मथुरा और वाराणसी (Varanasi) जैसे धार्मिक नगरों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, परंतु इसे शास्त्र-सम्मत धार्मिक कृत्य मानना गलत होगा।
विश्वभर में भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा
भारतीय संस्कृति को विश्व में योग (Yoga), ध्यान (Meditation), आध्यात्मिकता (Spirituality) और आयुर्वेद के लिए सम्मान मिलता है। जब हम भांग को धर्म से जोड़ते हैं, तो यह भारतीय संस्कृति की गलत छवि (wrong image) प्रस्तुत करता है।
वैश्विक पाठकों (global readers) को समझना चाहिए कि भारतीय धर्म-दर्शन मादक पदार्थों के सेवन को प्रोत्साहित नहीं करता, बल्कि आत्मशुद्धि (self-purification), संयम और सात्विक जीवन (pure lifestyle) का मार्ग दिखाता है।
शिवरात्रि की असली साधना
महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ है – “शिव की रात्रि” अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की यात्रा। इस दिन की पूजा-अर्चना में शामिल है:
- व्रत (Fasting): शरीर और मन की शुद्धि
- रुद्राभिषेक (Rudrabhishek): शिवलिंग पर जल, दूध, शहद का अभिषेक
- बेलपत्र अर्पण (Offering Belpatra): त्रिपत्रक बेलपत्र से पूजा
- ध्यान-जाप (Meditation and chanting): “ॐ नमः शिवाय” का जप
- जागरण (Night vigil): रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन
इनमें कहीं भी भांग या किसी नशीले पदार्थ का उल्लेख नहीं है।
FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या वेदों में भांग का उल्लेख है?
हाँ, अथर्ववेद में भांग को पाँच पवित्र औषधियों में गिना गया है, परंतु इसे मनोरंजक नहीं, बल्कि चिकित्सीय उपयोग के लिए बताया गया है।
2. क्या भगवान शिव भांग पीते थे?
नहीं, किसी भी प्रामाणिक शास्त्र (शिव पुराण, लिंग पुराण) में यह उल्लेख नहीं है। यह एक लोक धारणा मात्र है।
3. क्या शिवरात्रि पर भांग पीना अनिवार्य है?
बिल्कुल नहीं। शिवरात्रि की पूजा में व्रत, रुद्राभिषेक, बेलपत्र अर्पण और ध्यान-जप शामिल हैं, भांग नहीं।
4. भांग के औषधीय गुण क्या हैं?
आयुर्वेद के अनुसार भांग पीड़ानाशक, निद्राकारक और वात-कफ शामक है, परंतु केवल वैद्य के निर्देशन में उपयोग करनी चाहिए।
5. क्या भांग धार्मिक रूप से स्वीकार्य है?
भांग एक औषधि है। धार्मिक दृष्टि से कोई भी ऐसा पदार्थ स्वीकार्य नहीं जो मन-बुद्धि को विकृत करे या स्वास्थ्य हानि पहुंचाए।
निष्कर्ष (Conclusion)
महाशिवरात्रि पर भांग पीना न तो शास्त्र-सम्मत है, न ही अनिवार्य धार्मिक कृत्य। यह एक लोक परंपरा है जो सांस्कृतिक विकास के दौरान उत्पन्न हुई। भांग निश्चित रूप से एक औषधीय पौधा है जिसके चिकित्सीय लाभ हैं, परंतु इसका उपयोग केवल योग्य वैद्य के मार्गदर्शन में, नियंत्रित मात्रा में और चिकित्सीय उद्देश्य से ही किया जाना चाहिए।
धर्म का मार्ग संयम, शुद्धता और आत्म-नियंत्रण का है। भगवान शिव स्वयं “योगेश्वर” (Lord of Yoga) हैं – ध्यान, संयम और तपस्या के प्रतीक। उनकी सच्ची भक्ति सात्विक जीवन, सेवा, और आत्मशुद्धि से होती है, न कि किसी नशीले पदार्थ के सेवन से।
आइए, हम महाशिवरात्रि को उसके असली अर्थ में मनाएं – आंतरिक जागरण (inner awakening), आध्यात्मिक उन्नति (spiritual growth) और भगवान शिव के गुणों को अपने जीवन में उतारने का पर्व।
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