बद्रीनाथ मन्दिर
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बद्रीनाथ मन्दिर का इतिहास

Badrinath Temple बद्रीनाथ मन्दिर या बद्रीनाथ धाम  भारत के उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित हैं। यहां श्री विष्णु भगवान की स्वयंभू  प्रतिमा हैं। हिन्दू धर्म का यह पवित्र स्थल है। सनातन परम्परा में हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। यह समुद्र तल से 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह हिमालय पर्वत श्रृंखलाओ के मध्य स्थित हैं। ऋषिकेश से यह 294 km की दूरी पर उत्तर में स्थित हैं 

Badrinath Temple  बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु के बद्रीनारायण  रुप की पूजा होती हैं। आदि शंकराचार्य ने ८ वी (आठवी) शताब्दी में नजदीक के नारद कुण्ड से इस प्रतिमा को निकालकर स्थापित किया था। यह मूर्ति लगभग १ मीटर लम्बी एवम् शालिग्राम से निर्मित है । 

विष्णुपुराण, स्कन्दपुराण एवम् महाभारत  आदि कई ग्रन्थों में बद्रीनाथ मन्दिर का वर्णन मिलता हैं। Badrinath Temple बद्रीनाथ मन्दिर को अलग अलग काल खण्डो में अलग अलग नामों से जाना जाता रहा हैं।

सतयुग  मे इस क्षैत्र का नाम मुक्तिप्रदा  के नाम से जाना जाता था। जिसका वर्णन स्कन्दपुराण  मे किया गया है। त्रेतायुग में इस क्षैत्र को योगसिद्ध  कहा जाता था। द्वापर युग  में भगवान श्री विष्णु के प्रत्यक्ष दर्शन के कारण इसे मणिभद्र आश्रम  अथवा विशाला तीर्थ  कहा जाता था। कलियुग में इस धाम को बद्रीनाथ या बद्रिकाश्रम  के नाम से जाना जाता हैं । बद्रीनाथ क्षैत्र का नाम इस क्षैत्र में बहुतायत पाए जाने वाले बेर (बद्री) के वृक्षों के कारण पड़ा । 

पद्मपुराण में इस क्षैत्र को आध्यात्मिक निधियों से परिपूर्ण कहा गया है। वराहपुराण  के अनुसार मानव कहीं से भी बद्री का स्मरण करता रहे तो वह वैष्णव धाम को प्राप्त होता हैं।

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की इसी स्थान पर रचना की थी। इसी स्थान पर पांडवों ने अपने पूर्वजों का पिंडदान किया था। 

बद्रीनाथ की उत्पत्ति की कथा

एक बार नारदजी भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए क्षीर सागर गए। वहा माता लक्ष्मी को विष्णु भगवान के पांव दबाते देखा। नारदजी ने इस बारे मे विष्णु जी को पूछा तो अपराध बोध से ग्रसित विष्णु जी तपस्या करने हिमालय को चले गए।

जब विष्णु भगवान योग ध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे। तभी हिमपात होने लगा, उनको इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी जी का मन द्रवित हो उठा। माता लक्ष्मी ने स्वयं विष्णु जी के समीप खड़े होकर एक बद्री के वृक्ष का रूप ले लिया। और विष्णु जी को धूप, वर्षा और हिमपात से बचाने लगी।

जब विष्णु जी ध्यान मुद्रा से उठे तो लक्ष्मी की तपस्या से प्रसन्न होकर कहा कि हे देवी तुमने भी मेरे समान ही तप किया है। इसलिए इस धाम पर तुम्हें भी मेरे साथ पूजा जाएगा। तुमने बद्री वृक्ष बन कर मेरे रक्षा की है। अतः मुझे बद्री के नाथ (बद्री नाथ) के नाम से जाना जाएगा।

नर और नारायण की कथा

विष्णुपुराण  मे नर और नारायण की कथा आती हैं। उसके अनुसार धर्म के दो पुत्र नर और नारायण ने कई वर्षो तक इस स्थान पर तपस्या की। नर और नारायण ही अपने अगले जन्म में अर्जुन और श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया।

बद्रीनाथ मन्दिर का वर्तमान स्वरूप  

आदि शंकराचार्य ने गढ़वाल राज्य के शासक राजा कनकपाल की सहायता से इस स्वरूप को बनाया। इसके बाद उनके उत्तराधिकारीओ ने ही इस मंदिर की प्रबन्ध व्यवस्था संभाली। और मन्दिर कि ओर जाने वाले मार्ग पर कई गांव बसाए। वहा की प्रजा उनको “बोलंद बद्रीनाथ”कहती है। अर्थात् बोलते हुए बद्रीनाथ ।

गढ़वाल राज्य के सिंहासन को बद्रीनाथ की गद्दी कहा जाने लगा , उन्हें ” श्री बद्रीश्चरायपरायण गढराज महिमहेंद्र, धर्मवेभव, धर्मरक्षक, शिरोमणी भी कहते हैं। मन्दिर जाने से पूर्व भक्त राजा को श्रद्धा अर्पित करते थे।

16 वी सदी में गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने बद्रीनाथ मूर्ति को गुफा से लाकर वर्तमान मन्दिर में स्थापित किया। इसके बाद इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने यहां स्वर्ण कलश छत्र चढ़ाया। 

हिमस्खलनओ के कारण मन्दिर कई बार क्षति ग्रस्त हुआ। सन् 1803 में मंदिर को नुकसान होने से जयपुर के राजा द्वारा जीर्णोद्वार करवाया गया। मन्दिर को विभिन्न राजाओं द्वारा दान किए गए ग्रामों से राजस्व की प्राप्ति होती हैं। 

ब्रिटिश शासन के समय भी मन्दिर प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष गढ़वाल के राजा ही होते थे।

बद्रीनाथ धाम का रहस्य

बद्रीनाथ मन्दिर के कपाट छः माह बन्द रहते हैं। लेकिन इस मन्दिर में नियमित अखण्ड ज्योति जलती रहती है। विष्णुपुराण, वराहपुराण और महाभारत आदि में इसकी महिमा का वर्णन है। बद्रीनाथ मन्दिर के पास एक तप्त कुण्ड है। उसमें सदा शुद्ध गर्म जल आता रहता हैं। इस जल में औषधीय गुणों के कारण चर्म रोग आदि ठीक होने की मान्यता के कारण श्रद्धालु यहां स्नान करते हैं। इसमें स्नान करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती हैं।

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