मृत्यु के बाद आत्मा को क्यों दिया जाता है तर्पण?
सनातन

जीवन और मृत्यु का अटूट बंधन

भारतीय संस्कृति में मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत माना जाता है। जब किसी प्रियजन का देहांत (demise) होता है, तो हमारे हृदय में केवल शोक ही नहीं, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञता (gratitude) और उनकी आत्मा की शांति की भावना भी जन्म लेती है। इसी भावना को व्यक्त करने का माध्यम है तर्पण (Tarpan) – एक ऐसा पवित्र कर्म जो हजारों वर्षों से हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।

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लेकिन आपने कभी सोचा है कि मृत्यु के बाद आत्मा को तर्पण क्यों दिया जाता है? क्या यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान (religious ritual) है या इसके पीछे कोई गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य छुपा है? आइए, इस लेख में हम वेदों, उपनिषदों, पुराणों और आधुनिक वैज्ञानिक शोध के माध्यम से इस प्रश्न का उत्तर खोजें।

तर्पण क्या है? परिभाषा और मूल अर्थ

तर्पण शब्द संस्कृत के ‘तृप्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है तृप्त करना या संतुष्ट करना (to satisfy)। तर्पण एक पवित्र विधि है जिसमें देवताओं, ऋषियों और पितरों (ancestors) को जल, तिल (sesame seeds), कुश (sacred grass) और अक्षत (rice grains) के साथ श्रद्धापूर्वक जल अर्पित किया जाता है।

तर्पण के तीन प्रकार:

1. देव तर्पण (Deva Tarpan): देवताओं को प्रसन्न करने के लिए
2. ऋषि तर्पण (Rishi Tarpan): महान ऋषि-मुनियों और गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता के लिए
3. पितृ तर्पण (Pitru Tarpan): हमारे पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति और शांति के लिए

इस लेख में हम विशेष रूप से पितृ तर्पण की बात करेंगे – जो मृत्यु के बाद हमारे प्रियजनों की आत्मा के लिए किया जाता है।

वैदिक साहित्य में तर्पण का प्रमाण

ऋग्वेद का पितृ सूक्त (Rigveda’s Pitru Sukta)

भारतीय वैदिक परंपरा में तर्पण की प्रथा अत्यंत प्राचीन है। ऋग्वेद के दशम मंडल में पितृ सूक्त में कहा गया है:

“पितरो नः पितामहाः प्रपितामहाश्च ये।
ते नः संतु प्रसन्नाश्च स्वधाभाजः सदा स्थिताः।।”

अर्थ: हमारे पिता, पितामह (grandfather) और प्रपितामह (great-grandfather) हम पर सदा प्रसन्न रहें और स्वधा (offerings for ancestors) के भागी बने रहें।

यजुर्वेद का संदर्भ

यजुर्वेद में पितृ यज्ञ (Pitru Yajna) को पंच महायज्ञों में से एक माना गया है:

“पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।”

यह मंत्र पितरों को स्वधा (पवित्र भोजन और जल) अर्पित करने का निर्देश देता है।

मनुस्मृति का उल्लेख

महर्षि मनु ने अपनी संहिता में कहा है:

“अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।” (मनुस्मृति 3/70)

अर्थ: ब्रह्मयज्ञ अध्यापन है और पितृयज्ञ तर्पण है। तर्पण के माध्यम से हम अपने पितरों के प्रति ऋण (debt) चुकाते हैं।

गरुड़ पुराण: मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा

गरुड़ पुराण (Garuda Purana) हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा का विस्तृत वर्णन करता है। इस पुराण के अनुसार:

मृत्यु के बाद प्रथम 13 दिन

जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा 13 दिनों तक अपने घर और परिजनों के आस-पास ही रहती है। इस दौरान आत्मा सूक्ष्म शरीर (subtle body) में होती है और अपने जीवनकाल के कर्मों का साक्षात्कार करती है।

गरुड़ पुराण में कहा गया है:

“त्रयोदशे दिवसे तु प्रेतदेहं परित्यजेत्।
पिंडदानेन संस्कारात् पितृत्वं प्राप्यते तदा।।”

अर्थ: तेरहवें दिन प्रेत शरीर (spirit body) का त्याग होता है और पिंडदान (offering of rice balls) तथा संस्कार से आत्मा पितृ लोक (realm of ancestors) में प्रवेश करती है।

यमलोक की यात्रा और तर्पण का महत्व

गरुड़ पुराण के अनुसार, 13वें दिन के बाद आत्मा यमलोक (realm of Yama, the god of death) की यात्रा प्रारंभ करती है। यह यात्रा अत्यंत कठिन और लंबी है। इस मार्ग में अनेक बाधाएं और कष्ट आते हैं।

तर्पण और श्राद्ध कर्म इस यात्रा को सरल और सुगम बनाने में सहायक होते हैं। जल तर्पण से आत्मा की प्यास बुझती है, तिल से उसे शक्ति मिलती है, और श्रद्धापूर्वक किया गया दान उसके मार्ग को प्रकाशित करता है।

“तिलोदकं प्रदत्तेन तर्पिताः पितरः सदा।
शांतिं प्राप्नुवन्ति ते सर्वे मोक्षमार्गं प्रयान्ति च।।”

अर्थ: तिल युक्त जल से तर्पित पितर शांति पाते हैं और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होते हैं।

तर्पण क्यों आवश्यक है? आध्यात्मिक कारण

1. पितृ ऋण से मुक्ति (Liberation from Ancestral Debt)

भारतीय दर्शन में तीन प्रकार के ऋण माने गए हैं:

– देव ऋण (Debt to Gods): देवताओं के प्रति
– ऋषि ऋण (Debt to Sages): गुरुजनों और ज्ञान देने वालों के प्रति
– पितृ ऋण (Debt to Ancestors): माता-पिता और पूर्वजों के प्रति

हमारा अस्तित्व हमारे पूर्वजों की देन है। उन्होंने हमें जीवन दिया, पाला-पोसा, शिक्षित किया। तर्पण के माध्यम से हम उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और इस ऋण से मुक्त होते हैं।

2. आत्मा की तृप्ति और शांति

मृत्यु के बाद आत्मा को अपनी सांसारिक इच्छाओं और अधूरे कार्यों का बोध होता है। श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से हम उन इच्छाओं की पूर्ति का प्रतीकात्मक प्रयास करते हैं। यह आत्मा को तृप्ति (satisfaction) प्रदान करता है और उसे मोक्ष (liberation) की ओर अग्रसर करता है।

3. पितृ दोष का निवारण

ज्योतिष शास्त्र (astrology) के अनुसार, यदि पितरों की आत्मा असंतुष्ट या अशांत रहती है, तो परिवार में पितृ दोष (Pitru Dosha) की स्थिति बनती है। इससे परिवार में:

  • संतान प्राप्ति में बाधा
  • आर्थिक संकट (financial problems)
  • स्वास्थ्य समस्याएं
  • मानसिक अशांति

नियमित तर्पण और श्राद्ध से पितृ दोष का निवारण होता है और परिवार में सुख-समृद्धि (prosperity) आती है।

4. पीढ़ियों के बीच संबंध की निरंतरता

तर्पण केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों (generations) को जोड़ने वाली एक सांस्कृतिक कड़ी है। जब हम अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं, तो हम अपनी जड़ों (roots) से जुड़े रहते हैं। यह हमें अपनी पहचान और सांस्कृतिक विरासत (cultural heritage) का बोध कराता है।

तर्पण का वैज्ञानिक आधार

आधुनिक विज्ञान भी धीरे-धीरे प्राचीन भारतीय परंपराओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक सत्य को स्वीकार कर रहा है। तर्पण से संबंधित कुछ वैज्ञानिक तथ्य:

1. ऊर्जा का संरक्षण (Conservation of Energy)

भौतिक विज्ञान का नियम है – ऊर्जा न तो उत्पन्न होती है और न ही नष्ट होती है, केवल रूप बदलती है। यही सिद्धांत आत्मा पर भी लागू होता है। भगवद्गीता (Bhagavad Gita) में श्रीकृष्ण कहते हैं:

“न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।”
(गीता 2.20)

अर्थ: आत्मा न जन्मती है, न मरती है। यह अजन्मा (unborn), नित्य (eternal) और शाश्वत (permanent) है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।

2. मनोवैज्ञानिक लाभ (Psychological Benefits)

आधुनिक मनोविज्ञान (psychology) में “Grief Counseling” और “Closure” की अवधारणा है। तर्पण और श्राद्ध कर्म व्यक्ति को:

– शोक से मुक्ति (Relief from Grief): प्रियजन की मृत्यु का दुःख सहना आसान होता है
– मानसिक शांति (Mental Peace): यह भावना कि हमने अपना कर्तव्य निभाया
– भावनात्मक संतुलन (Emotional Balance): पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर

2020 में प्रकाशित एक शोध (Pitra Paksh – An Age Old Ritual From Modern Perspective, HealthyBazar) के अनुसार, तर्पण जैसे अनुष्ठान व्यक्ति को अपराध बोध (guilt) से मुक्त करते हैं और मन को शुद्ध (purify) करते हैं।

3. खगोलीय प्रभाव (Astronomical Impact)

पितृ पक्ष (Pitru Paksha) आश्विन मास की पूर्णिमा से अमावस्या तक चलता है। यह समय विशेष खगोलीय स्थिति का होता है। इस अवधि में:

  • सूर्य (Sun) कन्या राशि (Virgo) में होता है
  • चंद्रमा (Moon) क्षीण होता जाता है
  • विशेष ग्रह योग (planetary combinations) बनते हैं

भारतीय ऋषियों का मानना था कि इस समय पृथ्वी और पितृ लोक के बीच ऊर्जा प्रवाह (energy flow) सर्वाधिक होता है, जिससे तर्पण का लाभ पितरों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचता है।

4. जल और तिल का विज्ञान

जल (Water): जल एक उत्कृष्ट ऊर्जा वाहक (energy conductor) है। आधुनिक शोध में यह सिद्ध हुआ है कि जल भावनाओं और संकल्पों (intentions) को ग्रहण करता है। जापानी वैज्ञानिक डॉ. मासारू इमोटो (Dr. Masaru Emoto) के प्रसिद्ध जल क्रिस्टल प्रयोग (water crystal experiments) ने दिखाया कि जल की संरचना मानवीय भावनाओं से प्रभावित होती है।

तिल (Sesame Seeds): तिल में उच्च मात्रा में तेल और पोषक तत्व होते हैं। प्राचीन मान्यता के अनुसार, तिल पितरों को ऊर्जा प्रदान करते हैं। तिल के बीज की कड़वी परत (outer layer) पापों का प्रतीक मानी जाती है जो जल में घुलकर नष्ट हो जाती है।

तर्पण विधि: सम्पूर्ण प्रक्रिया

आवश्यक सामग्री (Materials Required)

1. तांबे या पीतल का पात्र (copper or brass vessel)
2. शुद्ध जल (pure water)
3. काले तिल (black sesame seeds)
4. जौ या चावल (barley or rice)
5. कुश या दर्भ घास (Kusha grass)
6. सफेद पुष्प (white flowers)
7. तुलसी पत्ते (Tulsi leaves)
8. अक्षत (unbroken rice grains)
9. पवित्र जनेऊ (sacred thread)

तर्पण की विधि (Step by Step Procedure)

तर्पण
सनातन

पहला चरण – शुद्धिकरण:

  • प्रातःकाल स्नान करें
  • स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • दक्षिण दिशा (South direction) की ओर मुख करके बैठें
  • जनेऊ बाएं कंधे पर (left shoulder) रखें – यह अपसव्य (Apasavya) कहलाता है

दूसरा चरण – संकल्प (Resolution):

हाथ में जल, तिल और अक्षत लेकर संकल्प लें:

“ॐ श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं पितृ तर्पणं करिष्ये।”

अर्थ: मैं परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए पितृ तर्पण करूंगा।

तीसरा चरण – तर्पण मंत्र:

प्रत्येक अंजलि (handful) में जल, तिल और कुश लेकर निम्न मंत्र बोलें:

“ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।” (पिता पक्ष के पितरों के लिए)
“ॐ मातामह्येभ्यः स्वधा नमः।” (माता पक्ष के पितरों के लिए)
“ॐ प्रपितामह्येभ्यः स्वधा नमः।” (प्रपितामह के लिए)

तीन-तीन बार जल छोड़ें।

चौथा चरण – समापन:

“ॐ पितरः प्रीयन्ताम्। आयुष्मान् भवेत् सुतः।”

अर्थ: पितर प्रसन्न हों। पुत्र दीर्घायु हो।

विशेष तिथियां (Special Days for Tarpan)

– अमावस्या (New Moon Day): प्रत्येक माह की अमावस्या
– पितृ पक्ष (Pitru Paksha): आश्विन मास में 16 दिन
– मृत्यु तिथि (Death Anniversary): पितर की वार्षिक तिथि
– सूर्य और चंद्र ग्रहण (Solar and Lunar Eclipse)
– महालया अमावस्या (Mahalaya Amavasya): सर्वपितृ तर्पण के लिए

आधुनिक युग में तर्पण: प्रासंगिकता और समायोजन

घर में रहकर तर्पण कैसे करें?

यदि आप नदी या तीर्थ स्थान (pilgrimage site) पर नहीं जा सकते, तो घर में भी तर्पण कर सकते हैं:

1. घर के आंगन या छत पर स्वच्छ स्थान चुनें
2. एक बड़े पात्र में जल भरें
3. दक्षिण दिशा की ओर मुख करें
4. विधिवत तर्पण करें
5. जल को किसी पौधे की जड़ में डालें

महिलाएं तर्पण कर सकती हैं?

परंपरागत रूप से पुरुष सदस्य तर्पण करते थे, लेकिन आधुनिक समय में महिलाओं को भी तर्पण का अधिकार है। यदि परिवार में कोई पुरुष सदस्य नहीं है, तो पुत्री या पत्नी श्रद्धापूर्वक तर्पण कर सकती है।

पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाण

सिंधु घाटी सभ्यता में पितृ पूजा

पुरातत्व विभाग (Archaeological Department) के शोध से पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization, 3300-1300 BCE) में भी मृतकों के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते थे। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में मिले कब्रों में:

  • खाद्य पदार्थों के अवशेष
  • जल के लिए मिट्टी के पात्र
  • व्यक्तिगत सामान

ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि प्राचीन भारतीय समाज मृत्यु के बाद भी आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करता था।

विश्व की अन्य संस्कृतियों में पूर्वज पूजा

चीन (China): Qingming Festival – पूर्वजों की कब्रों की सफाई और प्रसाद चढ़ाना
जापान (Japan): Obon Festival – पूर्वजों की आत्माओं का स्वागत
मैक्सिको (Mexico): Dia de los Muertos (Day of the Dead) – मृतकों का उत्सव
अफ्रीका (Africa): विभिन्न जनजातियों में पूर्वज पूजा की परंपरा

यह वैश्विक समानता (global similarity) दर्शाती है कि मानव सभ्यता में पूर्वजों के प्रति सम्मान एक सार्वभौमिक भावना (universal emotion) है।

FAQ: आपके प्रश्न

प्रश्न 1: मृत्यु के कितने दिन बाद तर्पण करना चाहिए?

उत्तर: मृत्यु के 13वें दिन पर पहला श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इसके बाद प्रथम वार्षिक श्राद्ध मृत्यु के एक वर्ष बाद किया जाता है। फिर प्रत्येक वर्ष मृत्यु तिथि पर, अमावस्या को या पितृ पक्ष में नियमित तर्पण करना चाहिए।

प्रश्न 2: पितृ तर्पण के क्या लाभ हैं?

उत्तर: पितृ तर्पण के अनेक लाभ हैं:

  • आध्यात्मिक: पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्ति में सहायता
  • पारिवारिक: पितृ दोष निवारण, परिवार में सुख-समृद्धि
  • व्यक्तिगत: मानसिक शांति, संतान प्राप्ति, आर्थिक स्थिरता
  • सामाजिक: पीढ़ियों के बीच बंधन मजबूत होना
प्रश्न 3: क्या बिना पंडित के स्वयं तर्पण कर सकते हैं?

उत्तर: हां, आप स्वयं तर्पण कर सकते हैं। भगवान सूर्य को जगत पंडित माना जाता है। यदि पंडित उपलब्ध नहीं है, तो आप सूर्य देव के सामने श्रद्धापूर्वक तर्पण कर सकते हैं। महत्वपूर्ण है भावना की शुद्धता (purity of emotion), न कि केवल बाहरी अनुष्ठान।

प्रश्न 4: तर्पण में किन मंत्रों का उच्चारण करें?

उत्तर: मुख्य तर्पण मंत्र:

  • “ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः” (पिता पक्ष के पितरों के लिए)
  • “ॐ मातामह्येभ्यः स्वधा नमः” (माता पक्ष के पितरों के लिए)
  • “ॐ सर्वेभ्यः पितृभ्यः स्वधा नमः” (सभी पितरों के लिए सामूहिक तर्पण)
  • “ॐ अर्यमा न त्रिप्यताम्” (पितरों के देवता अर्यमा के लिए)
प्रश्न 5: यदि मृत्यु की तिथि याद नहीं है तो क्या करें?

उत्तर: यदि मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो महालया अमावस्या (Mahalaya Amavasya) पर सर्वपितृ तर्पण करें। यह पितृ पक्ष की अंतिम अमावस्या होती है जब सभी अज्ञात और भूले हुए पितरों का सामूहिक श्राद्ध किया जाता है। इसे सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या भी कहते हैं।

प्रश्न 6: क्या गया जी में पिंडदान के बाद फिर तर्पण करना जरूरी है?

उत्तर: हां, गया में पिंडदान (Pind Daan in Gaya) करने के बाद भी वार्षिक श्राद्ध और नियमित तर्पण करना चाहिए। गया का पिंडदान विशेष मोक्ष प्राप्ति के लिए है, लेकिन पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना एक निरंतर प्रक्रिया है। यह हमारे संस्कार और परंपरा का हिस्सा है।

प्रश्न 7: महिलाएं मासिक धर्म के दौरान तर्पण कर सकती हैं?

उत्तर: परंपरागत रूप से मासिक धर्म (menstruation) के दौरान महिलाओं को धार्मिक कार्यों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। हालांकि, आधुनिक विचारधारा में यह मान्यता बदल रही है। यदि आप श्रद्धा से तर्पण करना चाहती हैं, तो मन में भावना रखकर मंत्र उच्चारण कर सकती हैं। भगवान भावना को देखते हैं, बाहरी स्थिति को नहीं।

प्रश्न 8: तर्पण का जल कहां छोड़ना चाहिए?

उत्तर:

  • आदर्श: पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, नर्मदा आदि) में
  • वैकल्पिक: घर के पास की किसी नदी, तालाब या कुएं में
  • घर में: किसी तुलसी या पीपल के पौधे की जड़ में
  • शहर में: घर की छत पर दक्षिण दिशा में जमीन पर

मुख्य बात यह है कि जल पृथ्वी या जल स्रोत तक पहुंचे, न कि नाली में बह जाए।

निष्कर्ष: तर्पण – श्रद्धा और विज्ञान का संगम

मृत्यु के बाद आत्मा को तर्पण देना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानवता, कृतज्ञता और आध्यात्मिकता का सुंदर मिश्रण है। यह हमें सिखाता है कि:

1. जीवन नश्वर है, पर संबंध अमर हैं। हमारे पूर्वजों की स्मृति और उनके संस्कार हमारे साथ रहते हैं।

2. कृतज्ञता सबसे बड़ा धर्म है। जिन्होंने हमें जीवन दिया, उनके प्रति हमारा कर्तव्य मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होता।

3. आध्यात्मिक विकास में पूर्वजों की भूमिका। हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाता है।

4. विज्ञान और आध्यात्मिकता में सामंजस्य। प्राचीन भारतीय परंपराएं वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हैं।

जैसा कि गीता में कहा गया है:

“यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।”
(गीता 6.30)

अर्थ: जो मुझे सब में और सब को मुझमें देखता है, वह मुझसे अलग नहीं होता और न मैं उससे अलग होता हूं।

यही भाव तर्पण का मूल है – हम सब एक ही चेतना के अंश हैं। मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। तर्पण के माध्यम से हम इस अटूट बंधन को मान्यता देते हैं और अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करने में सहायता करते हैं।

आज के भौतिकवादी युग (materialistic era) में, जहां हम अपने वर्तमान में इतने व्यस्त हैं कि अपने अतीत को भूल जाते हैं, तर्पण हमें याद दिलाता है कि हम अपने पूर्वजों की विरासत हैं। उनके त्याग, संघर्ष और आशीर्वाद के कारण ही आज हम हैं।

तो आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम अपने पितरों का नियमित रूप से तर्पण करेंगे, उनकी स्मृतियों को जीवित रखेंगे और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे।

“पितृभ्यः स्वधा नमः। ॐ शांति।”

संदर्भ ग्रंथ और स्रोत (References and Sources)

प्राचीन ग्रंथ:

  • ऋग्वेद (Rigveda) – दशम मंडल, पितृ सूक्त
  • यजुर्वेद (Yajurveda) – पितृ यज्ञ संदर्भ
  • गरुड़ पुराण (Garuda Purana) – प्रेत कल्प
  • मनुस्मृति (Manu Smriti) – अध्याय 3
  • भगवद्गीता (Bhagavad Gita) – अध्याय 2 और 6

आधुनिक शोध:

  • “Scientific Facts: Why Pitru Shradh” – Worldwide Hindu Temples, 2023
  • “Pitra Paksh – An Age Old Ritual From Modern Perspective” – HealthyBazar, 2020
  • “Pind Daan In Gaya – Analyzing Its Importance” – Quest Journals, 2023
  • “What Is Tarpana? The Science of Ancestral Offerings” – Sanjay Koul Blog, 2025

Author: यह लेख प्राचीन वैदिक ज्ञान, पौराणिक संदर्भों और आधुनिक शोध के आधार पर तैयार किया गया है। तर्पण करते समय सबसे महत्वपूर्ण है भावना की पवित्रता। चाहे आप विस्तृत विधि करें या सरल तरीके से, यदि आपका हृदय श्रद्धा से भरा है, तो आपके पितर अवश्य प्रसन्न होंगे।

खास आपके लिए –

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